वास्तु शास्त्र के अनुसार शुभ फलदायक पौधे

   वास्तु और वृक्ष

पौधे हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं या यूँ कहें कि यह हमारे जीवन के लिए बहुत आवश्यक है।

पौधे हमारे जीवन के लिए अपने अस्तित्व को न्योछावर कर देते हैं। यह हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण अलग-अलग क्षेत्रों में जैसे फल-फूल,औषधि,इमारती लकड़ी,अन्न,कागज,बीज आदि से योगदान प्रदान करते हैं

घर के लिए 12 शुभ वृक्ष

कुछ पौधे तो ऐसे भी हैं जो तंत्र शास्त्र में और वास्तुदोष में अपनी भूमिका निभाते हैं ऐसे बहुत से पौधे हैं आज जो इन पौधों के बारे में जानकारी रखते हैं वह अपने घरों में इन पौधों को लगाकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं। आइए हम इन पौधों के बारे में चर्चा करते हैं।

शमी का पौधा

शमी का पौधा वैसे तो शिव से लेकर गणेशजी तक सभी देवी देवताओं को प्रिय है। परन्तु इसको विशेष रूप से शनि देव या शनि ग्रह से जोड़ा गया है। ऐसा विद्वानों का मत है। परन्तु मेरा जो अनुभव है जो इसे अपने घर सही दिशा के अनुसार लगाता है तो वास्तुदोष तो दूर होता ही है पर उसके घर और व्यापार में बहुमुखी तरक्की होती है।इसको घर में इस तरह लगाये कि घर से निकलते समय यह आपके दाहिनी ओर हो और रोजाना इसके दर्शन हो।शनिवार के दिन इसके नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए और अपने समस्त पापों की क्षमा याचना मांग कर मंगल कामना करना चाहिए। यह बहुत ही महत्वपूर्ण पौधा है। यह धन को चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच लेता है।

काली हल्दी का पौधा

यह पौधा भी तंत्र शास्त्र में अपना विशेष महत्त्व रखता है। यह काली हल्दी का पौधा है। काली हल्दी का तिलक लगाने से सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।व्यक्ति समाज में विशेष स्थान प्राप्त करता है। इसकी जड़ में अपनी लम्बाई के बराबर मोली (कलावा) शुक्रवार के दिन बांधने के बाद इसे शुद्ध जल से स्नान करायें तो साधक की एक इच्छा अवश्य पूरी होती है।


 क्रेशुला का पौधा

क्रेशुला एक विशेष प्रकार की घास होती है यह जिस घर मे होती है उस घर में पैसा चुम्बक की तरह अपनी ओर खिचा चला आता है। यह एक अद्भुत किस्म की शक्ति अपने पास रखती है। इसकी पत्ती काफी चिकनी होती हैं। यह प्रायः आपको कुछ कोठियो मे लगी मिलती है।




लाल कनेर का फूल

लाल कनेर का फूल गणेश भगवान को प्रसन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता है। जो व्यक्ति प्रतिदिन इन पुष्पों को गणेश जी को अर्पित करता है गणेश जी उसके सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं।अगर किसी के यहाँ श्वेतार्क गणेशजी हैं तो उस तो अपनी पूजा गणेश जी के पुष्पों को अवश्य अर्पित करना चाहिए।







पीपल का वृक्ष

आप ने पीपल का नाम तो काफी सुना होगा। वास्तव में इस वृक्ष को शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु का वृक्ष माना गया है। इस वृक्ष की सेवा करके अपने पापों से मुक्ति पायी जा सकती है। यह दीर्घ आयु वाला वृक्ष होता है। इसके नीचे पूजा करके अपने मनोरथ व्यक्ति पूर्ण कर लेता है। इसकी जड़ में कच्चा दूध और जल प्रतिदिन चढ़ाने से घर में  समृद्धि बढ़ने लगती है।






तुलसी का पौधा

घर के अंदर रखने वाला पौधा 
 तुलसी के पौधे को कौन नहीं जानता होगा?इसके अनेक फायदे हैं। यह औषधि युक्त पौधा तो है ही परन्तु इसके साथ यह शुभता का प्रतीक है और यह घर के समस्त वास्तुदोष भी दूर करता है। इसकी लोकप्रियता बहुत है। इसका वर्णन तो पवित्र ग्रन्थों में भी है। इस पौधे पर स्नान करने बाद प्रतिदिन जल चढ़ाना चाहिए। इसकी माला बनाकर लोग पूजा में प्रयोग करते हैं।





नागदमन का पौधा

नागदमन एक बहुत ही दुर्लभ पौधा है। ऐसा माना जाता है कि यह नागों का दमन कर देता है इसलिए नाग इस पौधे के आसपास भी नहीं भटकते।इसका भी तंत्र शास्त्र में प्रयोग होता है। इस पौधे की जड़ को शुभ नक्षत्र और दिन में ग्रहण कर दुकान या घर के दरवाजे पर टांगने मात्र से ही काला जादू और नकारात्मक ऊर्जा दूर भागते हैं। किया कराया खत्म हो जाता है और जहां यह होता है वहां स्वतः ही समृद्धि आने लगती है।





मनीप्लान्ट पौधा

इस पौधे से भी बहुत लोग परिचित हैं। यह पौधा धन को चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच लेता है। अलग-अलग लोग के मत इस पौधे के बारे में है। कोई कहता है कि चोरी करके इस पौधे को लगाना चाहिए और कोई कहता है कि खरीद कर लगाये। मत कोई भी हो लेकिन समृद्धि लानी है तो इसे जरूर लगाये।
बरगद वृक्ष
बरगद वृक्ष 

बरगद वृक्ष के बारे में आपने अवश्य ही सुना होगा। बहुत से महापुरुषों ने इसके नीचे ज्ञान प्राप्त किया है। यह वृक्ष ब्रह्मा जी का प्रतीक माना गया है है। यह वृक्ष अनेक विद्वानों को सिद्धि प्रदान करने के लिए सहायक है। और यह औषधि युक्त पौधा तो है ही परन्तु इसके साथ यह शुभ कार्य कराने सहायता करता है।इस वृक्ष को लगाकर सींचने वाला समस्त पापों से मुक्ति पा जाता है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है।

अपराजिता


श्वेत और नीली अपराजिता दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर शुभ कार्य कराने में सहायता करता है। परन्तु तंत्र शास्त्र में श्वेत अपराजिता को विशेष स्थान प्राप्त है यह घरों की बाहरी दिवार पर लगायी जाती है। यह पौधा धन को घर में आमन्त्रित करता है। साथ ही घर बुरी नजर से बचा रहता है। जिस घर मे यह लगी होती है वहां लक्ष्मी कृपा हमेंशा बनी रहती है।






हत्था जोड़ी का पौधा

हत्था जोड़ी का पौधा एक दुर्लभ पौधा है। इस पौधे का तंत्र शास्त्र में विशेष स्थान है। इसकी असली जड़ यदि किसी को मिला जाये तो समझलो लक्ष्मी और चामुंडा देवी की कृपा हो गयी।वह व्यक्ति कभी भी कोर्ट केस नहीं हारेगा और ना ही कानूनी पचड़े में फसेगा।सम्मोहन शक्ति इतनी तेज होगी कि पल भर में हर किसी को अपना बना लेगा।इस जड़ को दीपावली के दिन सिद्ध करलें।



भोजपत्र 


भोजपत्र का तंत्र और मंत्र सभी बहुत ही प्रयोग होता है इसलिए इसका तंत्र शास्त्र में विशेष स्थान है। जितने भी यंत्र और ताबीज़ बनाये जाते हैं उनमें लगभग सभी में इसे प्रयोग करते हैं। इस पर बना यंत्र बहुत जल्दी ही फल देने लगता है। यह एक भोजपत्र नाम के पौधे की छाल की पर्त होती है जो काम में लायी जाती है।
 आशा करता हूँ कि यह जानकारी आपको पसन्द आयी होगी। मित्रों फिर मिलूंगा एक नई जानकारी के साथ तब तक के लिए नमस्कार ..........

जड़ों से ग्रह शान्त करें

अशुभ ग्रहों की शान्ति के लिए अनेक विद्वानों ने अपने अपने अनेक उपाय बताये हैं।आज के विद्वान तो बहुत ही कीमती उपाय बता रहे हैं। जो मध्यम या निम्न वर्ग के लिए सम्भव नहीं है। ग्रहोंका प्रभाव तो विचारे उन लोगों पर भी होता है ऐसे में वे क्या करें। आज हम उनके लिए विशेष प्रभावी उपाय लेकर आये हैं। और बिल्कुल निःशुल्क। आप यदि थोड़ी सी मेहनत करके ग्रहों को शान्त करने में सफल हो जायेंगे। जैसा कि नीचे आपको बताया गया है कि ग्रह से सम्बंधित जड़ धारण करें और उनसे सम्बंधित मंत्र बतायी गयी संख्या में जाप करें। अधिक जानकारी के लिए आप हमारे ग्रह से सम्बंधित जानकारी के समस्त भाग पढ़ले तो, आपको दिनों का भी ज्ञान हो जायेगा।

सूर्य 
बीज मंत्र:- ऊँ घृणि: सूर्याय नम:
जप संख्या- सवा लाख
जड़ी- आक की जड़ रविपुष्य योग में ग्रहण की हुई धारण करें।

चन्द्र 
बीज मंत्र:- ऊँ सों सोमाय नम:
जप संख्या- सवा लाख
जड़ी- ढाक की लकड़ी, खिरनी का मूल धारण करें।

मंगल
बीज मंत्र:- ऊँ अं अंगारकाय नम:
जप संख्या- सवा लाख
जड़ी- खदिर की जड़ या नाग जिह्वा (अनन्त मूल) धारण करें।

बुध
बीज मंत्र:- ऊँ बुं बुधाय नम:
जप संख्या-सवा लाख
जड़ी- अपामार्ग,विधारा की जड़ धारण करें।

बृहस्पति
बीज मंत्र:- ऊँ बृं बृहस्पते नमः
जप संख्या-एक लाख
जड़ी- पीपल मूल या भांरगी धारण करें।

शुक्र
बीज मंत्र:- ऊँ शुं शुक्राय नमः
जप संख्या- सवा लाख
 जड़ी- ओदुम्बर या सिंह पुच्छ का मूल धारण करें।

शनि
बीज मंत्र:- ऊँ शं शनैश्चराय नमः
जप संख्या- सवा लाख
जड़ी- छोकरा(शमी) की लकड़ी या बिच्छु घास की जड़ धारण करें।

राहु
बीज मंत्र:- ऊँ रां राहवे नमः
जप संख्या- सवा लाख
जड़ी- कुश (डाब) की जड़ या सफेद चन्दन अथवा दुर्वा की जड़ धारण करें।

केतु 
बीज मंत्र:- ऊँ कें केतवे नमः
जप संख्या- सवा लाख
जड़ी- असगन्ध की जड़ या काश की जड़ धारण करें।





पंचांग की जानकारी भाग 3

योग 

अश्विनी नक्षत्र के प्रारंभ से सूर्य और चन्द्रमा दोनों मिलकर 800 कलाओं को आगे चलतें हैं। इन्हीं 800 कलाओं के चलते एक योग बीतता है। इसी प्रकार जब दोनों ग्रह 12 राशियां अर्थात 21600 कलाओं को अश्विनी नक्षत्र से आगे चलते हैं तब यह 27 योग बीतते हैं।

सूर्य और चन्द्रमा दोनों के स्पष्ट स्थानों को जोड़कर तथा कलाऐं बनाकर 800 का भाग देने पर गत योगों की संख्या निकाल लेते हैं। बाकी यह पता करें कि वर्तमान योग की कितनी कलाएँ बीत गयीं। शेष को 800 में से घटाने पर वर्तमान योग की गम्य कलाएँ निकल आतीं हैं। इन कलाओं को 30 से गुणा कर सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट दैनिक गति से भाग देने पर वर्तमान योग की गत और गम्य घटिकाऐं निकल आतीं हैं।

    योग            स्वामी            योग            स्वामी            योग            स्वामी  
       
    1-विष्कुम्भ            यम                    प्रीति                विष्णु            आयुष्मान            चन्द्रमा 
    2-सौभाग्य             ब्रह्मा                  शोभन              बृहस्पति       अतिगण्ड            चन्द्रमा 
    3-सुकर्मा              इन्द्र                   धृति                  जल               शूल                   सर्प
    4-गण्ड                अग्नि                    वृद्धि                 सूर्य               ध्रुव                    भूमि
    5-व्याघात             वायु                     हर्षण               भग                वज्र                   वरूण
    6-सिद्धि               गणेश                  व्यतीपात          रूद्र               वरीयान              कुबेर
    7-परिघ               विश्वकर्मा               शिव                मित्र               सिद्धि                कार्तिकेय
    8-साध्य               सावित्री                  शुभ                लक्ष्मी              शुक्ल                 पार्वती
    9-ब्रह्म                 अश्विनी कुमार        ऐन्द्र                पितर              वैधृति                 दिती

 


अगले भाग  में  हम करण के और उनके स्वामियों के बारे में जानेंगे...................



पंचांग की जानकारी भाग 2

पिछले भाग में हमने जाना  वार और तिथियों के बारे में अब हम चर्चा करेंगे नक्षत्र की

नक्षत्र  

ज्योतिष में आकाश को 27 भागों में विभाजित किया गया है। उन 27 भागों के नाम हैं। इन्हीं को नक्षत्र कहते हैं।प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया गया है।
इन 27 नक्षत्रों से अलग एक अभिजित् नक्षत्र 28वाँ विद्वानों ने माना है। उत्तराषाढ़ा की अन्तिम 15 घटी और श्रवण की प्रथम चार घटी मिलाकर अभिजित् नक्षत्र बनता है। जिसके स्वामी ब्रह्मा जी है। इस नक्षत्र में कोई भी कार्य प्रारंभ किया जाये तो सिद्ध होता है।

     नक्षत्र                       स्वामी                      चरणाक्षर

   1- अश्विनी                   अश्विनीकुमार             चू चे चो ला
   2- भरणी                     काल                       ली लू ले लो
   3- कृत्तिका                  अग्नि                       आ ई  उ  ए
    4- रोहिणी                    ब्रह्मा                       ओ वा  वी वू
    5- मृगशिरा                  चन्द्रमा                    वे  वो का की
     6- आद्रा                      रूद्र                        के  घ  ङ  छ 
    7- पुनर्वस                    अदिति                     के को हा ही
    8- पुष्य                      बृहस्पति                   हू  हे  हो  डा   
    9- आश्लेशा                  सर्प                       डी  डू  डे  डो
  10- मघा                        पितर                     मा  मी  मू  मे 
  11- पूर्वाफाल्गुनी               भग                     मो  टा  टी  टू
  12- उत्तराफाल्गुनी          आर्यमा                    टे  टो पा  पी
  13-  हस्त                       सूर्य                          पू  ष  ण  ठ 
  14- चित्रा                       विश्वकर्मा                     पे पो रा री
  15- स्वाती                     पवन                           रू रे रो ता 
  16- विशाखा                  शुक्राग्नि                       ती तू ते तो
  17- अनुराधा                  मित्र                           ना नी नू ने
  18- ज्येष्ठ                       इन्द्र                          नो या यी यू
  19- मूल                     निर्ऋति                        ये  यो भा भी
  20- पूर्वाषाढ़ा                जल                            भू धा फा ढा
  21- उत्तराषाढ़ा            विश्वदेव                         भे भो जा जी
  22-  श्रवण                 विष्णु                           खी खू खे खो
  23- धनिष्ठा                 वसु                               गा गी गू गे
  24- शतभिषा             वरूण                            गो सा सी सू
  25- पूर्वाभाद्रपदा         अजैकपाद                      से सो दा दी
  26- उत्तराभाद्रपदा       अहिर्बुध्न्य                        दू थ झ ञ
  27- रेवती                   पूषा                              दे दो चा ची
  28- अभिजित्              ब्रह्मा                           जू जे जो खा

विशेष:- ङ ,ञ ,ण इन अक्षरों से नाम नहीं बन सकते इसलिए नक्षत्र के आधार पर इन अक्षरों से नाम प्रारंभ है तो ङ के स्थान पर घ, ञ के स्थान पर दु एवं ण के स्थान पर पू नाम प्रारंभ किया जाता है। ऐसा करने से नक्षत्र भेद नहीं होता है।

नक्षत्रों की  संज्ञाओं

पंचक संज्ञक नक्षत्रधनिष्ठा , शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद,रेवती  इन नक्षत्रों में कार्य करना शुभ माना जाता है। परन्तु किसी की मृत्यु होने पर शान्ति अवश्य करायें।

मूल संज्ञक नक्षत्रअश्विनी ,आश्लेषा , मघा, ज्येष्ठा, मूल ,रेवती  इनमें बालक का जन्म होने पर शान्ति कराना बहुत आवश्यक है।


गण्डान्त संज्ञक नक्षत्रअश्विनी, मघा, मूल की दो घड़ी और ज्येष्ठा, आश्लेषा, रेवती के अन्त की दो घड़ी गण्ड मूल संज्ञक हैं। इनमें बच्चे का जन्म हुआ हो महाशुभ होता है परन्तु विधानानुसार शान्ति परम आवश्यक है।

ध्रुव संज्ञक नक्षत्ररोहिणी ,उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपदा, उत्तराषाढ़ा  ये नक्षत्र कार्यों में विध्नकारी होते हैं।

चर या चल संज्ञक नक्षत्र  - स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा इनका कार्यानुसार फल प्राप्त होता है।

उग्र संज्ञक नक्षत्रभरणी ,मघा ,पूर्वाभाद्रपद ,पूर्वाफाल्गुनी ,पूर्वाषाढ़ा  इनका भी कार्यानुसार फल प्राप्त होता है।

मिश्र संज्ञक नक्षत्र - कृत्तिका और विशाखा दोनों ही समान नक्षत्र हैं।

लघु संज्ञक नक्षत्र  - अश्विनी, पुष्य, हस्त ,अभिजित्  ये कार्य के अनुसार फल देते हैं।

मृदु संज्ञक नक्षत्र- मृगशिरा,चित्रा, अनुराधा, रेवती ये सामान्य नक्षत्र हैं।

तीक्ष्ण संज्ञक नक्षत्र -आद्रा ,आश्लेषा ,ज्येष्ठा, मूल इन नक्षत्रों में कार्य करने से पीड़ा होती है और कार्य का नाश होता है।

अधोमुख संज्ञक नक्षत्र- भरणी, कृत्तिका,आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी,विशाखा,मूल,पूर्वाषाढ़ा,पूर्वाभाद्रपद इन नक्षत्रों में नीव खोदना,कुआँ,तालाब खोदना, नल लगाना वर्जित है।

उर्ध्वमुख संज्ञक नक्षत्र- आद्रा,पुष्य,श्रवण,धनिष्ठा,शतभिषा  इनका फल कार्य के अनुसार ही प्राप्त होता है।

तिर्यड्मुख संज्ञक नक्षत्र- अश्विनी,पुनर्वसु,हस्त,स्वाति अनुराधा और ज्येष्ठा इनक फल भी कार्य के अनुसार ही प्राप्त होता है।

दग्ध संज्ञक नक्षत्र- रविवार को भरणी,सोमवार को चित्रा,मंगलवार को उत्तराषाढ़ा,बुधवार को धनिष्ठा,गुरुवार को उत्तराफाल्गुनी,शुक्रवार को ज्येष्ठा तथा शनिवार को रेवती  ये दग्ध संज्ञक नक्षत्र हैं। इनमें शुभ कार्य करना वर्जित है।

मास शून्य नक्षत्र-चैत्र में रोहिणी और अश्विनी,वैशाख में चित्रा और स्वाति,ज्येष्ठ में उत्तराषाढ़ा और पुष्य आषाढ़ में पूर्वाफाल्गुनी और धनिष्ठा,श्रावण मास में उत्तराषाढ़ा और श्रवण,भाद्रपद मास में शतभिषा और रेवती,अश्विन में पूर्वाभाद्रपद,कार्तिक मास में कृत्तिका और मघा,मार्गशीर्ष में चित्रा और विशाखा,पौष मास में आद्रा,अश्विनी और हस्त,माघ मास में श्रवण और मूल, फाल्गुन में भरणी और ज्येष्ठा नक्षत्र मास शून्य नक्षत्र होते हैं।

इस भाग में हमने नक्षत्रों के बारे में जाना और अगले भाग में हम योगों के बारे में चर्चा करेंगे .............

पंचांग की जानकारी

पंचांग परिचय 

वार,तिथि,नक्षत्र,योग और करण का समन्वयक विश्लेषण जिसमें मिले उसे पंचांग के नाम से जाना जाता है।

वार

ज्योतिष में सप्तवार है जिनको सूर्यवार,चन्द्रवार,भौमवार,बुधवार,गुरुवार,भृगुवार और मन्दवार के नाम से जाना जाता है।

तिथियां

तिथि        उनके स्वामी         तिथि         उनके स्वामी

प्रतिपदा    अग्नि              चतुर्दशी                 शिव
द्वितीया      ब्रह्मा               पूर्णि                    चन्द्रमा
तृतीया       गौरी               अमावस्या              पितर
चतुर्थ         गणेश जी        पंचमी                   शेष
षष्ठी          कार्तिकेय         सप्तमी                  सूर्य 
अष्टमी       शिव                नवमी                   दुर्गा       
दशमी        काल               एकादशी              विश्वदेव
द्वादशी      विष्णु                त्र्योदशी               काम

अमावस्या के तीन भेद
 1- सिनीवाली :- प्रातः काल से लेकर रात तक रहने वाली           अमावस्या।  
2-दर्शन:-जो अमावस्या चतुर्दशी मूत्रवर्धक  हो।
3-कुहू :- जो अमावस्या प्रतिपदा से युक्त हो ।

नन्दा           भद्रा           जया            रिक्ता           पूर्णा
प्रतिपदा     द्वितीया       तृतीया         चतुर्थी           पंचमी
षष्ठी          सप्तमी       अष्टमी          नवमी           दशमी
एकादशी    द्वादशी       त्र्योदशी        चतुर्दशी        पूर्णिमा

इस तरह नन्दा, भद्रा ,जया , रिक्ता , पूर्ण ये पाँच प्रकार की तिथियाँ हैं तथा 4,6,8,9,12,14 तिथियाँ पक्ष रन्ध्र संज्ञक हैं।

गण्डान्त तिथि-नन्दा तिथि के आदि की तथा पूर्णा तिथि के अन्त की एक घड़ी गण्डान्त और नेष्ट मानी जाती है।


मास की शून्य तिथियाँ ज्योतिष शास्त्र में अशुभ मानीं जाती हैं। जो निम्नलिखित हैं-
चैत मास के दोनों पक्षों की- अष्टमी और नवमी
 वैशाख के दोनों पक्षों की-द्वादशी
ज्येष्ठ में शुक्ल पक्ष की -चतुर्दशी
आषाढ़ में कृष्ण पक्ष की षष्ठी और शुक्ल पक्ष की सप्तमी
श्रावण मास में दोनों पक्षों की - द्वितीय और  तृतीया 
भाद्रपद में दोनों पक्षों की - प्रतिपदा और द्वितीया 
आश्विन में दोनों पक्षों की - दशमी और एकादशी 
कार्तिक में कृष्ण पक्ष की  - पंचमी और शुक्ल पक्ष की-चतुर्दशी 
मार्गशीर्ष में दोनों पक्षों की – सप्तमी और अष्टमी 
पौष मास में दोनों पक्षों की – चतुर्थी और पंचमी 
माघ में कृष्ण पक्ष की – पंचमी और शुक्ल पक्ष की – षष्ठी 
फाल्गुन में कृष्ण पक्ष की – चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की – तृतीया 
ये सभी शून्य तिथियाँ हैं। जो अशुभ मानीं जाती हैं। 

यदि इन तिथियोंके साथ निम्नलिखित वार हों तो ये तिथियाँ शुभ मानीं जाती हैं। इन तिथियों में कार्य प्रारंभ किया जाये तो सिद्ध होता है। 

तिथियाँ                               वार
3,8,13                                मंगलवार
2,7,13                                 बुधवार
5,10,15                              बृहस्पतिवार
1,6,11                                 शुक्रवार
4,9,14                                 शनिवार

निम्नलिखित तिथियों के साथ निम्न वार हों तो दग्ध एवं अशुभ तिथि कहलाती हैं। 

रवि    सोम    भौम     बुध    गुरु      शुक्र     शनि       फल

12     11       5         3          6      8         9           दग्ध
4        6        7         2          8      9         7            विष
12      6        7         5          9     10      11          हुताशन

इन तिथियों में कार्य प्रारंभ किया जाये तो कभी भी लाभकारी नहीं होता है।

इस भाग में हमने वार और तिथियों के बारे में जाना अगले भाग में नक्षत्रोंके बारे में जानेंगे ................


दिनमान

दिनमान
1 घटी (घड़ी) =60पल
1पल =60विपल
1विपल =60कला
1कला =60विकला
1विकला =60 सकला
60घटी(घड़ी) =दिन-रात
विषेश- कभी दिन बड़ा तो कभी रात।पंचांग में दिनमान प्रतिदिन का दिया जाता है। 60घटी में दिनमान घटाने पर रात्रि का मान आ जाता है।अथवा 5/2 पल या 60 सैकैण्ड का 1मिनट,
60पल =24मिनट =1घटी
5/2घटी =1घण्टा
15/2घटी =3घण्टे
3घण्टे =1प्रहर
8प्रहर=60घटी =24घण्टे =दिन-रात या एक अहोरात्र
15 अहोरात्र =एक पक्ष
2पक्ष =एक मास या महीना
12मास=एक वर्ष
60 कला =एक अंश
60अंश =एक राशि
12राशि =एक भगण