पिछले भाग में हमने जाना वार और तिथियों के बारे में अब हम चर्चा करेंगे नक्षत्र की
इन 27 नक्षत्रों से अलग एक अभिजित् नक्षत्र 28वाँ विद्वानों ने माना है। उत्तराषाढ़ा की अन्तिम 15 घटी और श्रवण की प्रथम चार घटी मिलाकर अभिजित् नक्षत्र बनता है। जिसके स्वामी ब्रह्मा जी है। इस नक्षत्र में कोई भी कार्य प्रारंभ किया जाये तो सिद्ध होता है।
विशेष:- ङ ,ञ ,ण इन अक्षरों से नाम नहीं बन सकते इसलिए नक्षत्र के आधार पर इन अक्षरों से नाम प्रारंभ है तो ङ के स्थान पर घ, ञ के स्थान पर दु एवं ण के स्थान पर पू नाम प्रारंभ किया जाता है। ऐसा करने से नक्षत्र भेद नहीं होता है।
नक्षत्र
ज्योतिष में आकाश को 27 भागों में विभाजित किया गया है। उन 27 भागों के नाम हैं। इन्हीं को नक्षत्र कहते हैं।प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया गया है।इन 27 नक्षत्रों से अलग एक अभिजित् नक्षत्र 28वाँ विद्वानों ने माना है। उत्तराषाढ़ा की अन्तिम 15 घटी और श्रवण की प्रथम चार घटी मिलाकर अभिजित् नक्षत्र बनता है। जिसके स्वामी ब्रह्मा जी है। इस नक्षत्र में कोई भी कार्य प्रारंभ किया जाये तो सिद्ध होता है।
नक्षत्र स्वामी चरणाक्षर
1- अश्विनी अश्विनीकुमार चू चे चो ला
2- भरणी काल ली लू ले लो
3- कृत्तिका अग्नि आ ई उ ए
4- रोहिणी ब्रह्मा ओ वा वी वू
5- मृगशिरा चन्द्रमा वे वो का की
6- आद्रा रूद्र के घ ङ छ
7- पुनर्वस अदिति के को हा ही
8- पुष्य बृहस्पति हू हे हो डा
9- आश्लेशा सर्प डी डू डे डो
9- आश्लेशा सर्प डी डू डे डो
10- मघा पितर मा मी मू मे
11- पूर्वाफाल्गुनी भग मो टा टी टू
11- पूर्वाफाल्गुनी भग मो टा टी टू
12- उत्तराफाल्गुनी आर्यमा टे टो पा पी
13- हस्त सूर्य पू ष ण ठ
14- चित्रा विश्वकर्मा पे पो रा री
14- चित्रा विश्वकर्मा पे पो रा री
15- स्वाती पवन रू रे रो ता
16- विशाखा शुक्राग्नि ती तू ते तो
17- अनुराधा मित्र ना नी नू ने
18- ज्येष्ठ इन्द्र नो या यी यू
19- मूल निर्ऋति ये यो भा भी
20- पूर्वाषाढ़ा जल भू धा फा ढा
21- उत्तराषाढ़ा विश्वदेव भे भो जा जी
22- श्रवण विष्णु खी खू खे खो
23- धनिष्ठा वसु गा गी गू गे
24- शतभिषा वरूण गो सा सी सू
25- पूर्वाभाद्रपदा अजैकपाद से सो दा दी
26- उत्तराभाद्रपदा अहिर्बुध्न्य दू थ झ ञ
27- रेवती पूषा दे दो चा ची
28- अभिजित् ब्रह्मा जू जे जो खा
नक्षत्रों की संज्ञाओं
पंचक संज्ञक नक्षत्र – धनिष्ठा , शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद,रेवती इन नक्षत्रों में कार्य करना शुभ माना जाता है। परन्तु किसी की मृत्यु होने पर शान्ति अवश्य करायें।
मूल संज्ञक नक्षत्र – अश्विनी ,आश्लेषा , मघा, ज्येष्ठा, मूल ,रेवती इनमें बालक का जन्म होने पर शान्ति कराना बहुत आवश्यक है।
गण्डान्त संज्ञक नक्षत्र – अश्विनी, मघा, मूल की दो घड़ी और ज्येष्ठा, आश्लेषा, रेवती के अन्त की दो घड़ी गण्ड मूल संज्ञक हैं। इनमें बच्चे का जन्म हुआ हो महाशुभ होता है परन्तु विधानानुसार शान्ति परम आवश्यक है।
ध्रुव संज्ञक नक्षत्र – रोहिणी ,उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपदा, उत्तराषाढ़ा ये नक्षत्र कार्यों में विध्नकारी होते हैं।
चर या चल संज्ञक नक्षत्र - स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा इनका कार्यानुसार फल प्राप्त होता है।
उग्र संज्ञक नक्षत्र – भरणी ,मघा ,पूर्वाभाद्रपद ,पूर्वाफाल्गुनी ,पूर्वाषाढ़ा इनका भी कार्यानुसार फल प्राप्त होता है।
मिश्र संज्ञक नक्षत्र - कृत्तिका और विशाखा दोनों ही समान नक्षत्र हैं।
लघु संज्ञक नक्षत्र - अश्विनी, पुष्य, हस्त ,अभिजित् ये कार्य के अनुसार फल देते हैं।
मृदु संज्ञक नक्षत्र- मृगशिरा,चित्रा, अनुराधा, रेवती ये सामान्य नक्षत्र हैं।
तीक्ष्ण संज्ञक नक्षत्र -आद्रा ,आश्लेषा ,ज्येष्ठा, मूल इन नक्षत्रों में कार्य करने से पीड़ा होती है और कार्य का नाश होता है।
अधोमुख संज्ञक नक्षत्र- भरणी, कृत्तिका,आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी,विशाखा,मूल,पूर्वाषाढ़ा,पूर्वाभाद्रपद इन नक्षत्रों में नीव खोदना,कुआँ,तालाब खोदना, नल लगाना वर्जित है।
उर्ध्वमुख संज्ञक नक्षत्र- आद्रा,पुष्य,श्रवण,धनिष्ठा,शतभिषा इनका फल कार्य के अनुसार ही प्राप्त होता है।
तिर्यड्मुख संज्ञक नक्षत्र- अश्विनी,पुनर्वसु,हस्त,स्वाति अनुराधा और ज्येष्ठा इनक फल भी कार्य के अनुसार ही प्राप्त होता है।
दग्ध संज्ञक नक्षत्र- रविवार को भरणी,सोमवार को चित्रा,मंगलवार को उत्तराषाढ़ा,बुधवार को धनिष्ठा,गुरुवार को उत्तराफाल्गुनी,शुक्रवार को ज्येष्ठा तथा शनिवार को रेवती ये दग्ध संज्ञक नक्षत्र हैं। इनमें शुभ कार्य करना वर्जित है।
मास शून्य नक्षत्र-चैत्र में रोहिणी और अश्विनी,वैशाख में चित्रा और स्वाति,ज्येष्ठ में उत्तराषाढ़ा और पुष्य आषाढ़ में पूर्वाफाल्गुनी और धनिष्ठा,श्रावण मास में उत्तराषाढ़ा और श्रवण,भाद्रपद मास में शतभिषा और रेवती,अश्विन में पूर्वाभाद्रपद,कार्तिक मास में कृत्तिका और मघा,मार्गशीर्ष में चित्रा और विशाखा,पौष मास में आद्रा,अश्विनी और हस्त,माघ मास में श्रवण और मूल, फाल्गुन में भरणी और ज्येष्ठा नक्षत्र मास शून्य नक्षत्र होते हैं।
इस भाग में हमने नक्षत्रों के बारे में जाना और अगले भाग में हम योगों के बारे में चर्चा करेंगे .............
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