नीच ग्रह : शत-प्रतिशत बुरे फल देने वाले ग्रह “नीच ग्रह कहलाते हैं।
साथी ग्रह : जब कोई ग्रह अपने सुनिश्चित घर को छोड़कर अन्य ग्रहों के साथ अदल-बदल कर ले तो वह साथी ग्रह कहलाते हैं। साथी ग्रह शुभ फलदायक होतेहैं।
धर्मी ग्रह : चंद्र माता और बृहस्पति पिता , ब्राह्मण व दादा का कारक है। क्रूर व्यक्ति भी अपने माता पिता का अहित नहीं करेगा। अतः शनि-राहु माता चन्द्र और पिता बृहस्पति के घर में बैठ कर कभी बुरा नहीं करेंगे। कभी-कभी बृहस्पति पिता के घर में बुरा कर दे परन्तु चन्द्र माता के घर कभी बुरा नहीं करता।
पापी ग्रह : इसमें निम्नलिखित स्थितियां बनती हैं।
*यदि केन्द्र में 1, 4, 7, 10 घरों के स्वामी चन्द्र, शुक्र, बुध, बृहस्पति 3, 6, 8, 9, 11 घरों में बैठ जायें।
*यदि शनि 3 और 11 वें घर में चला जाता है।
*यदि मंगल 2, 3, 9 घर में चला गया हो।
बलवान ग्रह : यदि कोई ग्रह अपनी निश्चित राशि में स्थित हो तो वह बलवान ग्रह कहलाता है। इनके अच्छे या बुरे असर को रोकने की शक्ति किसी में नहीं होती।
स्थायी ग्रह : जो ग्रह किसी शत्रु ग्रह से न मिला हो और ना ही वह दृष्ट या नीच हो परन्तु अपने प्रभाव को वह किसी अन्य ग्रह के सहयोग के बिना स्थिर रखता है। स्थायी ग्रह कहलाता है ।
पुरुष ग्रह : जिन ग्रहों का प्रभाव दिन में अधिक दिखाई देता है। जैसे सूर्य, मंगल, बृहस्पति ।
स्त्री ग्रह : जिन ग्रहों का प्रभाव रात में अधिक और दिन में कम दिखाई देता है। जैसे चन्द्र, शुक्र, बुध
नोट- शनि का प्रभाव रात में ही दिखाई देता है।
मित्र ग्रह : जो ग्रह जिस घर में बैठा हो उससे सातवें घर में बैठा ग्रह------शत्रु ग्रह होने और गुप्त दुश्मनी रखने पर भी मित्र ग्रह होता है।
संदिग्ध ग्रह : जब कोई ग्रह अपने निश्चित घर को छोड़ कर अन्य ग्रह के घर या राशि में बैठ जायें तो वह संदिग्ध ग्रह कहलाता है।
नपुंसक ग्रह : बुध को नपुंसक ग्रह कहते हैं।
राहु ग्रह का प्रभाव रात में और केतु का प्रभाव दिन में अधिक दिखाई देता है।
सुप्त ग्रह : किसी घर में कोई ग्रह बैठा हो और उसके सामने वाले घर में कोई ग्रह न हो वह सुप्त ग्रह कहलाता है।
अशुभ-: ऐसा ग्रह जो अपने घर में नीच का हो या शत्रु के क्षेत्र में स्थित हो।
शुभ-: जो ग्रह अपने घर का स्वामी हो और उच्च या मित्र के क्षेत्र में स्थित हो।
साथी ग्रह : जब कोई ग्रह अपने सुनिश्चित घर को छोड़कर अन्य ग्रहों के साथ अदल-बदल कर ले तो वह साथी ग्रह कहलाते हैं। साथी ग्रह शुभ फलदायक होतेहैं।
धर्मी ग्रह : चंद्र माता और बृहस्पति पिता , ब्राह्मण व दादा का कारक है। क्रूर व्यक्ति भी अपने माता पिता का अहित नहीं करेगा। अतः शनि-राहु माता चन्द्र और पिता बृहस्पति के घर में बैठ कर कभी बुरा नहीं करेंगे। कभी-कभी बृहस्पति पिता के घर में बुरा कर दे परन्तु चन्द्र माता के घर कभी बुरा नहीं करता।
पापी ग्रह : इसमें निम्नलिखित स्थितियां बनती हैं।
*यदि केन्द्र में 1, 4, 7, 10 घरों के स्वामी चन्द्र, शुक्र, बुध, बृहस्पति 3, 6, 8, 9, 11 घरों में बैठ जायें।
*यदि शनि 3 और 11 वें घर में चला जाता है।
*यदि मंगल 2, 3, 9 घर में चला गया हो।
बलवान ग्रह : यदि कोई ग्रह अपनी निश्चित राशि में स्थित हो तो वह बलवान ग्रह कहलाता है। इनके अच्छे या बुरे असर को रोकने की शक्ति किसी में नहीं होती।
स्थायी ग्रह : जो ग्रह किसी शत्रु ग्रह से न मिला हो और ना ही वह दृष्ट या नीच हो परन्तु अपने प्रभाव को वह किसी अन्य ग्रह के सहयोग के बिना स्थिर रखता है। स्थायी ग्रह कहलाता है ।
पुरुष ग्रह : जिन ग्रहों का प्रभाव दिन में अधिक दिखाई देता है। जैसे सूर्य, मंगल, बृहस्पति ।
स्त्री ग्रह : जिन ग्रहों का प्रभाव रात में अधिक और दिन में कम दिखाई देता है। जैसे चन्द्र, शुक्र, बुध
नोट- शनि का प्रभाव रात में ही दिखाई देता है।
मित्र ग्रह : जो ग्रह जिस घर में बैठा हो उससे सातवें घर में बैठा ग्रह------शत्रु ग्रह होने और गुप्त दुश्मनी रखने पर भी मित्र ग्रह होता है।
संदिग्ध ग्रह : जब कोई ग्रह अपने निश्चित घर को छोड़ कर अन्य ग्रह के घर या राशि में बैठ जायें तो वह संदिग्ध ग्रह कहलाता है।
नपुंसक ग्रह : बुध को नपुंसक ग्रह कहते हैं।
राहु ग्रह का प्रभाव रात में और केतु का प्रभाव दिन में अधिक दिखाई देता है।
सुप्त ग्रह : किसी घर में कोई ग्रह बैठा हो और उसके सामने वाले घर में कोई ग्रह न हो वह सुप्त ग्रह कहलाता है।
अशुभ-: ऐसा ग्रह जो अपने घर में नीच का हो या शत्रु के क्षेत्र में स्थित हो।
शुभ-: जो ग्रह अपने घर का स्वामी हो और उच्च या मित्र के क्षेत्र में स्थित हो।
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