गजेन्द्र मोक्ष

मित्रो श्रीमद्भागवत पुराण गजेन्द्र मोक्ष की बड़ी महिमा बतायी है।इसका पाठ यशदायक, कलियुग के समस्त पाप नाशक,दुःस्वप्न नाशक,ऋण नाशक और मनोकामना पूर्ति का साधन है ।
                                        परिचय
मित्रो श्रीमदभागवत के अष्टम स्कन्ध में गजेन्द्र मोक्ष की कथा है। द्वितीय अध्याय में ग्राह (मगरमच्छ) के साथ गजेन्द्र के युद्ध का वर्णन है,तृतीय अध्याय में गजेन्द्र द्वारा भगवान् हरि की स्तुति का और गजेन्द्र मोक्ष का प्रसंग है और चतुर्थ अध्याय में गज-ग्राह के पूर्व जन्म का इतिहास है।इसकी भाषा और भाव सिद्धांत के प्रतिपादक और बहुत ही मनोहर हैं। भाव के साथ स्तुति करते करते मनुष्य का तन्मय हो जाता है। इस प्रकार वह जन्म मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। आशा करता हूँ कि आप इससे लाभान्वित जरूर होंगे। श्री हरि आपका कल्याण करें।

                                   गजेन्द्र मोक्ष
यों निश्चय कर व्यवसित मति से,मन प्रथम ह्रदय से जोड़ लिया।
फिर पूर्व जन्म में अनुशिक्षित,इस परम मंत्र का जाप किया।।1।।

                                   गजेन्द्र बोला
मन से है ऊँ नमन प्रभु को,जिससे ये जड़ चेतन बनता।
जो परम पुरुष,जो आदि बीज,सर्वोपरि जिसकी ईश्वरता ।।2।।
जिसमें,जिससे,जिसके द्वारा जग की सत्ता,जो स्वयं यही।
जो करण-कार्य-परे सबके,जो निजभू ,आज शरण्य वही ।।3।।
अपने में ही अपनी मायासे, ही रचे हुए संसार ।
को हो प्रकट,अन्तर्हित,कभी देखता उभय प्रकार।।
जो अविद्धदृक साक्षी बनकर,जो पर से भी सदा परे।
है जो स्वयं प्रकाशक अपना,मेरी रक्षा आज करें।।4।।
लोक,लोकपालों का,इन सबके कारण का भी सहांर।
कर देता सम्पूर्ण रूप से,महाकाल का कठिन कुठार।।
अन्धकार तब छा जाता है,एक,गहन,गंभीर, अपार।
उसके पार चमकते जो विभु ,वे लें मुझको आज संभार।।5।।
देवता तथ ॠषि लोग नहीं जिनके स्वरूप को जान सके ।
फिर कौन दूसरा जीव भला,जो उनको कभी बखान सके।।
जो करते नाना रूप धरे,लीला अनेक नटतुल्य रचा ।
है दुर्गम जिनका चरित-सिंधु ,वे महापुरुष लें मुझे बचा।।6।।
जो साधुस्वभावी,सर्वसुह्रद्  वे मुनिगण भी सब संग छोड़।
बस केवलमात्र आत्माका सब भूतों से सम्बन्ध जोड़।
जिनके मंगलमय पद-दर्शन की इच्छा से वन में पालन।
करते आलोक व्रत का अखण्ड,वे ही हैं मेरे अवलम्बन। ।7।।
जिसका होता है जन्म नहीं,केवल भ्रम से होता प्रतीत।
जो कर्म और गुण-दोष तथा जो नाम रूप से है अतीत। ।
रचनी होती जब सृष्टि किंतु ,जब करना होता उसका लय।
तब अंगीकृत कर लेता है,इन धर्मों को वह यथासमय। ।8।।
उस परमेश्वर,उस परमब्रह्म,उस अमित-शक्ति को नमस्कार।
जो अद्भुतकर्मा,जो अरूप,फिर भी लेता बहुरूप धार।।9।।
परमात्मा जो सबका साक्षी,उस आत्मदीप को नमस्कार।
जिस तक जाने में पथ में ही,जाते वाणी-मन-चित्त हार।।10।।
बन सतोगुणी सुनिवृत्तिमार्ग से,पाते जिसको विद्वज्जन।
जो सुखस्वरूप निर्वाण जनित,जो मोक्षधामपति,उसे नमन।।11।।
जो शान्त,घोर,जड़रूप प्रकट, होते तीनों गुण धर्म धार।
उन सौम्य,ज्ञानघन,निर्विशेष को नमस्कार है,नमस्कार। ।12।।
सबके स्वामी, सबके साक्षी,क्षेत्रज्ञ!तुझे है नमस्कार।
हे आत्ममूल,हे मूलप्रकृति,हे पुरुष,नमस्ते बार-बार।।13।।
इन्द्रिय-विषयों का जो द्रष्टा,इन्द्रियानुभवका जो कारन।
जो व्यक्त असत् की छाया में,हे सदाभास!है तुझे नमन।।14।।
सबके कारण,निष्कारण भी,हे विकृतिरहित सबके कारण।
तेरे चरणों में बार-बार,है नमस्कार मेरा अर्पण। ।
सब श्रुतियों,शास्त्रों का सारे,जो केवल एक अगाध निलय।
उस मोक्षरूप को नमस्कार,जिसमें पाते सज्जन आश्रय।।16।।
जो ज्ञानरूप से छिपा गुणों के बीच,काष्ठ में यथा अनल।
अभिव्यक्ति चाहता मन जिसका,जिस समय गुणों में हो हल-चल।।
मैं नमस्कार करता उसको,जो स्वयं प्रकाशित है उनमें।
आत्मालोचन करके न रहे,जो विधि-निषेध के बन्धन में।।16।।
जो मेरे जैसे शरणागत,जीवों का रहता है बन्धन।
उस मुक्त,अमित करूणा वाले,आलस्य रहित के लिए नमन।।
सब जीवों के मन के भीतर,जो है प्रतीत प्रत्यक्चेतन।
बन अन्तर्यामी,होभगवन!हे अपरिछिन्न!है तुझे नमन।।17।।
जिसका मिलना है सहज नहीं,उन लोगों को,जो सदा रमें।
लोगों में,धन में,मित्रो में,अपने में,पुत्रों में,घर में।।
जो निर्गुण,जिसका हृदय-बीच,जन अनासक्त करते चितंन।
हे ज्ञानरूप,हे परमेश्वर!हे भगवन !मेरा तुझे नमन।।18।।
जिनको विमोक्ष-धर्मार्थ काम की,इच्छा वाले जन भजकर।
वांछित फल को पा लेते हैं,जो देते तथा अयाचित वर।।
भी अपने भजने वालों को,कर देते हैं उनकी देह अमर।
लें वे ही आज उबार मुझे,इस संकट से करूणासागर।।19।।
जिनके अनन्य जन धर्म,अर्थ या काम-मोक्ष,पुरुषार्थ-सकल।
की चाह नहीं रखते मन में,जितनी बस,इतनी रूचि केवल।।
अत्यंत विलक्षण श्रीहरि के,जो चरित परम मंगल,सुन्दर।
आनंद-सिंधु में मग्न रहे,गा-गाकर उनकों निसि-वासर।।20।।
जो अविनाश,जो सर्वव्याप्त,सबका स्वामी सबके ऊपर।
अव्यक्त,किन्तु अध्यात्ममार्ग के पथिकों को है जो गोचर।।
इन्द्रियातीत,अति दूर-सदृश जो सूक्ष्म तथा जो है अपार।
कर-कर बखान मैं आज रहा,उस आदि पुरुष को ही पुकार।।21।।
उत्पन्न वेद,ब्रह्मादि देव,ये लोक सकल ,चर और अचर।
होते जिसकी बस,स्वरूप कला से नाना नाम-रूप धरकर।।22।।
ज्यों ज्वलित अग्नि से चिनगारी,ज्यों रवि से किरणें निकल-निकल।
फिर लौट उन्हीं में आ जाती हैं,गुणकृत प्रपंच उस भाँति सकल।।
मन,बुद्धि,सभी इन्द्रियों तथा सभी विविध योनियों वाले तन।
का जिससे प्रकटन हो जिसमें,हो जाता है पुनरावर्त्तन।।23।।
वही नहीं देव,वह असुर नहीं,वह नहीं मर्त्य,वह क्लीव नहीं।
वह कारण अथवा कार्य नहीं गुण,कर्म,पुरुष या जीव नहीं। ।
सबका कर देने पर निषेध जो कुछ रह जाता शेष,वही।
जो है अशेष हो प्रकट आज, हर ले मेरा सब क्लेश वही।।24।।
कुछ चाह नहीं जीवित रहने की,जो तमसावृत बाहर-भीतर—
ऐसे इस हाथी के तन को,क्या भला,करूँगा मैं रखकर?
इच्छा इतनी—बन्धन जिसका सुदृढ़ न काल से भी टूटे।
आत्मा की जिससे ज्योति ढँकी,अज्ञान वही मेरा टूटे।।25।।
उस विश्व सृजक,अज,विश्वरूप,जग से बाहर जग-सूत्रधार।
विश्वात्मा,ब्रह्म,परम पद को,इस मोक्षार्थी को नमस्कार।।26।।
निज कर्म जाल को भक्ति योग से जला,योग परिशुद्ध हृदय।
में जिसे देखते योगीजन,योगेश्वर प्रति मैं पत्नी सविनय।।27।।
हो सकता है सहन नहीं जिसकी त्रिगुणात्म-शक्ति का वेग प्रबल।
जो होता तथा प्रतीत धरे इन्द्रिय-विषयों का रूप सकल।
जो दुर्गम उन्हें मलिन विषयों में जो कि इन्द्रियों के उलझे।
शरणागत-पालक ,अमित-शक्ति हे!बारंबार प्रणाम तुझे।।28।।
अनभिज्ञ जीव जिसकी माया,कृत अहंकार द्वारा उपहत।
निज आत्मा से मैं उस दुरन्त महिमामय प्रभु के शरणागत।।29।।
                         
                          श्री शुकदेव जी ने कहा
यह निराकार-वपु भेदरहित की स्तुति गजेन्द्र-वर्णित सुनकर।
आकृति-विशेष वाले रूपों के अभिमानी ब्रह्मादि अमर।।
आये जब उसके पास नहीं;तब श्रीहरि जो आत्मा घट-घट।
के होने से सब देव रूप,हो गये वहाँ उस काल प्रकट।।30।।
वे देख उसे इस भाँति दुःखी,उसका यह आर्त्तस्तव सुनकर।
मन सी गति वाले पक्षिराज की चढ़े पीठ ऊपर सत्वर।।
आ पहुँचे,था गजराज जहाँ,निज कर में चक्र उठाये थे।
तब जगनिवास के साथ-साथ,सुर भी स्तुति करते आये थे।।31।।
अतिशय बलशाली ग्राह जिसे,था पकड़े हुए सरोवर में ।
गजराज देखकर श्रीहरि को,आसीन गरुड़ पर अम्बर में।।
खर चक्र हाथ में लिये हुए,वह दुखिया उठा कमल कर में।
‘हे विश्व-वन्द्य प्रभु!नमस्कार’यह बोल उठा पीड़ित स्वर में।।32।।
पीड़ा में उसको पड़ा देख,भगवान अजन्मा पड़े उतर।
अविलम्ब गरूड़ से फिर कृपया झट खींच सरोवर से बाहर।।
कर गज को मकर-सहित उसका मुख चक्रधार से चीर दिया।
देखते-देखते सुरगण के हरि ने गजेन्द्र को छुड़ा लिया।।33।।
https://youtu.be/xr9zrucAgxE





No comments:

Post a Comment